लखनऊ में आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के अंतिम दिन बुधवार को हरियाणा विधान सभा अध्यक्ष हरविन्द्र कल्याण ने चेयरमैन पैनल में शामिल होकर मंच साझा किया। यह सत्र उत्तर प्रदेश विधान सभा के मंडप हॉल में आयोजित किया गया। इस दौरान कार्यसूची से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक चर्चा की गई। इस सम्मेलन में 6 संकल्प अंगीकृत किए गए।
हरियाणा विस अध्यक्ष हरविन्द्र कल्याण की चेयरमैन पैनल में सहभागिता को संसदीय परंपराओं, विधायी गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनके अनुभव एवं दृष्टिकोण की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है। सत्र के दौरान विधायी कार्य संचालन, सदन की कार्यकुशलता बढ़ाने तथा संसदीय मर्यादाओं के पालन जैसे विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।
इस अवसर पर हरियाणा विधान सभा अध्यक्ष हरविन्द्र कल्याण ने कहा कि “अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन संसदीय लोकतंत्र को सशक्त बनाने का प्रभावी मंच है। चेयरमैन पैनल में सहभागिता के माध्यम से विभिन्न राज्यों की श्रेष्ठ विधायी परंपराओं को समझने और उन्हें अपनाने का अवसर मिलता है। हमारा दायित्व है कि हम सदनों को जन आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाएं और संसदीय मर्यादाओं की रक्षा करें।”
उन्होंने कहा कि पीठासीन अधिकारियों की भूमिका केवल कार्यवाही संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, अनुशासन और संवाद की संस्कृति को मजबूत करना भी उनकी जिम्मेदारी है।
इसके बाद सम्मेलन के समापन सत्र में लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला, राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ तथा उत्तर प्रदेश विधान सभा अध्यक्ष सतीश महाना ने अपने विचार व्यक्त किए। इस दौरान अनेक राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश ने हरविन्द्र कल्याण की अध्यक्षता में हरियाणा विधान सभा में हुई एक वर्ष की गतिविधियों को सराहना की है। उन्होंने कहा कि यह हरियाणा ने स्थानीय शहरी निकायों का राष्ट्रीय सम्मेलन कर सराहनीय कार्य किया है। दूसरे वक्ताओं ने भी हरियाणा विधान सभा की कार्यशैली की प्रशंसा की। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति कुँवर मानवेन्द्र सिंह द्वारा धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। इसके बाद राष्ट्रगान हुआ।
सम्मेलन में अंगीकृत किए गए संकल्प :
संकल्प संख्या 1 –
हम, भारत में विधायी निकायों के पीठासीन अधिकारी, 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में यह दृढ़ संकल्प लेते हैं कि हम अपनी-अपनी विधायिकाओं के कार्य संचालन के प्रति स्वयं को पुनः समर्पित करेंगे, ताकि वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति में योगदान दिया जा सके।
संकल्प संख्या 2 –
हम, पीठासीन अधिकारी, यह भी संकल्प लेते हैं कि सभी राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाकर राज्य विधायी निकायों की न्यूनतम तीस (30) बैठकें प्रति वर्ष की जाएँ तथा विधायी कार्यों के लिए उपलब्ध समय और संसाधनों का रचनात्मक एवं प्रभावी उपयोग किया जाए, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाएं जनता के प्रति उत्तरदायी हो सकें।
संकल्प संख्या 3-
हम, भारत के विधायी निकायों के पीठासीन अधिकारी, यह संकल्प लेते हैं कि विधायी कार्यों की सुगमता बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग को निरंतर सुदृढ़ किया जाएगा, जिससे जनता और उनकी विधायिकाओं के बीच प्रभावी संपर्क स्थापित हो सके तथा सार्थक सहभागी शासन सुनिश्चित किया जा सके।
संकल्प संख्या 4-
हम, पीठासीन अधिकारी, यह संकल्प लेते हैं कि सहभागी शासन की सभी संस्थाओं को आदर्श नेतृत्व प्रदान करना निरंतर जारी रखेंगे, ताकि हमारे राष्ट्र की लोकतांत्रिक परंपराएँ और मूल्य और अधिक गहरे तथा सशक्त बन सकें।
संकल्प संख्या 5-
हम, पीठासीन अधिकारी, यह संकल्प लेते हैं कि विशेष रूप से डिजिटल प्रौद्योगिकी के कुशल उपयोग के क्षेत्र में अपने सांसदों एवं विधायकों की क्षमता निर्माण का निरंतर समर्थन करेंगे तथा विधायिकाओं में होने वाली बहसों और चर्चाओं में जनप्रतिनिधियों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु शोध एवं अनुसंधान सहायता को सुदृढ़ करेंगे।
संकल्प सं.6-
हम, पीठासीन अधिकारीगण, यह संकल्प लेते हैं कि हमारे विधायी निकायों के कार्य संपादन का वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर मूल्यांकन एवं तुलनात्मक आकलन (बेंचमार्किंग) करने हेतु एक राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (National Legislative Index) का निर्माण किया जाए, जिससे जनहित में अधिक उत्तरदायित्व के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने हेतु अनुकूल वातावरण स्थापित हो सके।


